hindi poetry

तन्हाई

एक तन्हाई बरकरार थी उसके मेरे रिश्ते में …
मैंने हर पल को सजाया था,
उसने हर पल बिखेरा था,
मेरी बिंदी से लेकर मेरे झुमको को,
उसने बड़ा सताया था …
आज भी याद है वो पहली मुलाकत,
वो मुझको दुनिया से छिपा रहा था,
मैं उसको दुनिया कह रही थी …
कितना नाजुक था वो रिश्ता,
जिसकी डोर बहुत कमजोर हो रही थी …
मैंने रोका कई दफा था, लेकिन लाल जोड़े में बैठी मैं रो रही थी …
वो वापस आया भी तो एक कर्ज़ लेकर,
जिसकी कर्ज़दार मैं हो रही थी,
देती क्या उसको उस सौदेबाजी में, सब कुछ तो उस पर वार रखा था,
इस बंधन में बंधी थी कुछ यू,
मेहंदी गहरी, रिश्ते की डोर ढीली हो रही थी!!
मै सम्भालती भी कैसे खुदको,
इस हिज़्र में चाँदनी चाँद से जुदा हो रही थी …

 

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